रात का समय था। चारों ओर ऊँचे-ऊँचे पेड़ों से घिरा एक छोटा-सा मिट्टी का घर था, जिसकी छत फूस (छप्पर) से बनी हुई थी। हवा के झोंकों से पेड़ों की पत्तियाँ सरसराहट पैदा कर रही थीं, जिससे पूरा वातावरण रहस्यमय लग रहा था।
मैं उस घर के अंदर बैठा था। मिट्टी की दीवारों पर कुछ पुराने कपड़े टंगे हुए थे। कमरे में केवल दो चारपाइयाँ, एक कोने में मिट्टी के घड़े, कुछ बर्तन और गाँव के साधारण घरों में मिलने वाला सामान रखा था।
घर के अंदर चार युवा महिलाएँ थीं। सभी ने साधारण सूती साड़ियाँ पहन रखी थीं। उनमें से एक अपनी गोद में लगभग दो महीने के शिशु को स्नेह से झुला रही थी। बाकी महिलाएँ आपस में धीरे-धीरे बातें कर रही थीं।
मैं एक चारपाई पर बैठा था। कुछ देर बाद एक युवती मेरे पास आकर बैठ गई। उसकी आँखों में झिझक भी थी और अपनापन भी। हम दोनों धीरे-धीरे बातचीत करने लगे। बातचीत किसी रोमांटिक विषय पर नहीं, बल्कि जीवन की कठिनाइयों, गरीबी, मजबूरियों और भविष्य की उम्मीदों पर थी।
वह बोली, “कभी-कभी इंसान अपनी परिस्थितियों से हार जाता है, लेकिन सपने देखना नहीं छोड़ता।”
मैंने जवाब दिया, “शायद इसी उम्मीद के सहारे ज़िंदगी आगे बढ़ती है।”
सपनों का वह मिट्टी का घर
कमरे में बैठे बाकी लोग भी हमारी बातें सुन रहे थे। किसी के चेहरे पर मुस्कान थी तो किसी की आँखों में बीते दिनों की थकान साफ़ दिखाई दे रही थी। बाहर पेड़ों के बीच से आती हवा मिट्टी की खुशबू अपने साथ अंदर ला रही थी।
अचानक ऐसा लगा जैसे पूरा दृश्य धुंधला होने लगा हो। मिट्टी की दीवारें, चारपाइयाँ, टंगे हुए कपड़े, शिशु की हल्की आवाज़ और वह रहस्यमयी सन्नाटा—सब धीरे-धीरे धुएँ की तरह गायब होने लगा।
उसी क्षण मेरी आँख खुल गई।
कुछ पल तक मैं सोचता रहा कि यह केवल एक सपना था या किसी अनजानी दुनिया की एक झलक। उस सपने ने यह एहसास ज़रूर कराया कि हर व्यक्ति के पीछे एक ऐसी कहानी हो सकती है जिसे हम बाहर से देखकर कभी समझ नहीं पाते।
